Saturday, 28 June 2014
Wednesday, 25 June 2014
प्रश्न..
हे प्रभु !
आज एक चिड़िया ने मुझे सिखाया
कि बच्चे के पालन की जिम्मेदारी
माता पिता की है ,
ऐसा तब सीखा जब
चिड़िया अपने नवजात बच्चे के
मुख में दाना डाल रही थी,
यहां प्रश्न ये नहीं कि
चिड़िया ने मुझे क्या सिखाया ?
प्रश्न ये है कि चिड़िया को
यह सब सिखाने वाला
कौन है ?
हे प्रभु ! हे प्रभु !!
Location:
India
Tuesday, 24 June 2014
सुनो पुकार..
हे प्रभु !

अपना रथ चलाओ होकर उदार
करो इच्छाओं की पूर्ति
योजनाओं के बनो कर्णधार
अन्यथा, निरीह मनुष्य
कहाँ खड़ा हो सकता है जीवन के युद्ध में
जहाँ शत्रु के रूप में सामने
होता है प्रारब्ध, और नियति
विजय का मार्ग कौन
प्रशस्त करेगा अतिरिक्त आपके। ?
यह नियति यह प्रारब्ध
आपके ही अनुचर हैं
कृपया सुनो पुकार
अपना रथ चलाओ होकर उदार
करो इच्छाओं की पूर्ति
योजनाओं के बनो कर्णधार
हे प्रभु ! हे प्रभु !!
अपना रथ चलाओ होकर उदार
करो इच्छाओं की पूर्ति
योजनाओं के बनो कर्णधार
अन्यथा, निरीह मनुष्य
कहाँ खड़ा हो सकता है जीवन के युद्ध में
जहाँ शत्रु के रूप में सामने
होता है प्रारब्ध, और नियति
विजय का मार्ग कौन
प्रशस्त करेगा अतिरिक्त आपके। ?
यह नियति यह प्रारब्ध
आपके ही अनुचर हैं
कृपया सुनो पुकार
अपना रथ चलाओ होकर उदार
करो इच्छाओं की पूर्ति
योजनाओं के बनो कर्णधार
हे प्रभु ! हे प्रभु !!
Sunday, 22 June 2014
इसी सिद्धांत पर..
हे प्रभु !
आप नदी को बनाते हो
मीलों बहाते हो ,
उसे यहाँ से वहां, वहां से
यहाँ घुमाते हो ,
एक दिन नदी को समुद्र से
मिलाते हो।
समुद्र के जल से भाप बनाकर
बादल बनाते हो ,
बादलों से वर्षा कराते हो ,
वर्षा के पानी से
एक नयी नदी बनाते हो,
उसे फिर से मीलों -
बहाते हो ,
कदाचित इसी
सिद्धांत पर आप
पूरी सृष्टि को चलाते हो.
हे प्रभु ! हे प्रभु !!
Location:
India
Thursday, 19 June 2014
Sunday, 15 June 2014
परम पिता...
हे प्रभु !
आप शाश्वत हैं , कालजयी हैं, अनंत हैं
इसलिए भ्रम होता है कि
आपकी सृष्टि दुरूह है ,अनबूझ है
ऐसा केवल भ्रम होता है .
जबकि आप सरस हो
नदी की बहती जलधारा के समान ,
आप सरल हो जैसे
एक नवजात बच्चे की मुस्कान।
आप हो सनातन ,जीवन के रचयिता हो -
हमें प्राण देने वाले परमेश्वर हो,परम पिता हो।
हे प्रभु ! हे प्रभु !!
आप शाश्वत हैं , कालजयी हैं, अनंत हैं
इसलिए भ्रम होता है कि
आपकी सृष्टि दुरूह है ,अनबूझ है
ऐसा केवल भ्रम होता है .
जबकि आप सरस हो
नदी की बहती जलधारा के समान ,
आप सरल हो जैसे
एक नवजात बच्चे की मुस्कान।
आप हो सनातन ,जीवन के रचयिता हो -
हमें प्राण देने वाले परमेश्वर हो,परम पिता हो।
हे प्रभु ! हे प्रभु !!
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SPIRITUAL POETRY
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India
Friday, 13 June 2014
अबोध बालक...
हे प्रभु !
आपकी लीला का मूक दर्शक
बन कर खड़ा हूँ
एक अबोध बालक के समान ,
जिज्ञासा से भरा हुआ
मात्र घटनाओं का साक्षी बन ,
मात्र अनुमानों की नदी में
गोता लगाता
मात्र ये सोचता कि
इसका अर्थ यह है
उसका अर्थ वह है
हे प्रभु ! हे प्रभु !!
आपकी लीला का मूक दर्शक
बन कर खड़ा हूँ
एक अबोध बालक के समान ,
जिज्ञासा से भरा हुआ
मात्र घटनाओं का साक्षी बन ,
मात्र अनुमानों की नदी में
गोता लगाता
मात्र ये सोचता कि
इसका अर्थ यह है
उसका अर्थ वह है
हे प्रभु ! हे प्रभु !!
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Monday, 9 June 2014
तो घर जाऊं ..
हे प्रभु !
आपसे मैं क्या छुपाऊँ -
क्या छुपाऊँ, क्या बताऊँ
क्या करूँ, क्या ना करूँ ,
कैसे अब, मैं समझाऊं ,
आपसे अब क्या छुपा है
मुख अपना कैसे दिखाऊं ,
सर्वज्ञानी आप हो अब -
करो क्षमा,तो घर जाऊं
हे प्रभु ! हे प्रभु !!
आपसे मैं क्या छुपाऊँ -
क्या छुपाऊँ, क्या बताऊँ
क्या करूँ, क्या ना करूँ ,
कैसे अब, मैं समझाऊं ,
आपसे अब क्या छुपा है
मुख अपना कैसे दिखाऊं ,
सर्वज्ञानी आप हो अब -
करो क्षमा,तो घर जाऊं
हे प्रभु ! हे प्रभु !!
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प्रार्थना ...
हे प्रभु !
जगत का कल्याण कर
निर्बलों में प्राण भर
जगत का कल्याण कर।
कर सदा सहयोग सबका
मार्ग सबका कर प्रशस्त
आप सबका सूर्य बनना
जब हो हमारा सूर्य अस्त ,
ऊँगली पकड़ना, यदि गिरें
हो जाएँ यदि हम निढाल
दौड़ कर आकर प्रभु जी -
आप हमको लेना सँभाल ,
बिन सहारे आपके हम ,
जा ना पाएंगे उस पार,
करो कृपा अब ओ प्रभु
शीश झुकाता है संसार।
हे प्रभु !
जगत का कल्याण कर
निर्बलों में प्राण भर
जगत का कल्याण कर।
हे प्रभु ! हे प्रभु !!
जगत का कल्याण कर
निर्बलों में प्राण भर
जगत का कल्याण कर।
कर सदा सहयोग सबका
मार्ग सबका कर प्रशस्त
आप सबका सूर्य बनना
जब हो हमारा सूर्य अस्त ,
ऊँगली पकड़ना, यदि गिरें
हो जाएँ यदि हम निढाल
दौड़ कर आकर प्रभु जी -
आप हमको लेना सँभाल ,
बिन सहारे आपके हम ,
जा ना पाएंगे उस पार,
करो कृपा अब ओ प्रभु
शीश झुकाता है संसार।
हे प्रभु !
जगत का कल्याण कर
निर्बलों में प्राण भर
जगत का कल्याण कर।
हे प्रभु ! हे प्रभु !!
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Friday, 6 June 2014
कदाचित ...
हे प्रभु !
पक्षी आकाश में दिन भर उड़ता है
नीचे आ जाता है ,
आराम करता है फिर उड़ जाता है
आकाश की ओर ,
बार बार क्यों उड़ता है वो
ऊपर की ओर ?,
जबकि ऊपर न दाना है
न पानी है ,
कदाचित
उसे यह ज्ञात तो नहीं ?
कि ऊपर ही है सबको
दाना-पानी देने वाला
हे प्रभु ! हे प्रभु !!
पक्षी आकाश में दिन भर उड़ता है
नीचे आ जाता है ,
आराम करता है फिर उड़ जाता है
आकाश की ओर ,
बार बार क्यों उड़ता है वो
ऊपर की ओर ?,
जबकि ऊपर न दाना है
न पानी है ,
कदाचित
उसे यह ज्ञात तो नहीं ?
कि ऊपर ही है सबको
दाना-पानी देने वाला
हे प्रभु ! हे प्रभु !!
Wednesday, 4 June 2014
ठीक करो मेरे दोषों को...
हे प्रभु !
आपका नाम लेकर भी
पग- ठोकर खाने से बाज नहीं आते ,
नहीं होता नियंत्रण, अनुशासन
आपकी स्मृति से भी ,
होता है विद्रोह आपके मार्ग को छोड़
देने के लिए ,
मन की इस शोचनीय अवस्था के साथ
उपस्थित हूँ ,
दया करो, ठीक करो मेरे दोषों को ,
मुझमें नहीं और क्षमता
स्वयं को निर्मल रख सकने की ,
आपका नाम लेकर भी
पग- ठोकर खाने से बाज नहीं आते ,
नहीं होता नियंत्रण, अनुशासन
आपकी स्मृति से भी ,
होता है विद्रोह आपके मार्ग को छोड़
देने के लिए ,
मन की इस शोचनीय अवस्था के साथ
उपस्थित हूँ ,
दया करो, ठीक करो मेरे दोषों को ,
मुझमें नहीं और क्षमता
स्वयं को निर्मल रख सकने की ,
हे प्रभु ! हे प्रभु!!
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SPIRITUAL POETRY,
ठीक करो मेरे दोषों को
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India
Monday, 2 June 2014
इतने सारे अपरिचितों के बीच में ...
हे प्रभु !
आपकी वास्तविकता का
अंतिम छोर खोज लूँ , नहीं संभव, नहीं संभव ,
निज की वास्तविकता का ही छोर नहीं पता जब
तो आपकी वास्तविकता के पीछे कैसे दौड़ूं
या दौड़ूं भी या नहीं ?
मेरा तो मत यही है कि दौड़ूं
आपके पीछे ,उसी प्रकार -
जिस प्रकार एक बालक कातर स्वर में रोते हुए
दौड़ता है
अपने पिता के पीछे
जब ,पिता पहली बार बालक को विद्यालय में
"अपरिचितों" के बीच छोड़ कर जाता है ,
तो बालक दौड़ता है पिता के पीछे
प्रभु ! आपने भी तो मुझे जीवन के इस
'महा -महा-विद्यालय"
में छोड़ा है, इतने सारे अपरिचितों के बीच में ,
तब , मेरा , अबोध बालक के समान
आपके पीछे दौड़ना स्वाभाविक है
अनुकूल है
एक बालक की मूल प्रकृति के अनुसार।
हे प्रभु ! हे प्रभु !!
आपकी वास्तविकता का
अंतिम छोर खोज लूँ , नहीं संभव, नहीं संभव ,
निज की वास्तविकता का ही छोर नहीं पता जब
तो आपकी वास्तविकता के पीछे कैसे दौड़ूं
या दौड़ूं भी या नहीं ?
मेरा तो मत यही है कि दौड़ूं
आपके पीछे ,उसी प्रकार -
जिस प्रकार एक बालक कातर स्वर में रोते हुए
दौड़ता है
अपने पिता के पीछे
जब ,पिता पहली बार बालक को विद्यालय में
"अपरिचितों" के बीच छोड़ कर जाता है ,
तो बालक दौड़ता है पिता के पीछे
प्रभु ! आपने भी तो मुझे जीवन के इस
'महा -महा-विद्यालय"
में छोड़ा है, इतने सारे अपरिचितों के बीच में ,
तब , मेरा , अबोध बालक के समान
आपके पीछे दौड़ना स्वाभाविक है
अनुकूल है
एक बालक की मूल प्रकृति के अनुसार।
हे प्रभु ! हे प्रभु !!
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Sunday, 1 June 2014
आपके अप्रतिम सामर्थ्य को ...
हे प्रभु !
आप तो सृष्टा हो,
बनाये आपने बादल ,
धरा और आकाश आपने ही बनाया
बनाया सूरज
चाँद भी बनाया ,
लिखा हम सब का प्रारब्ध भी आपने
प्रभु !
सब कुछ तो हुआ है आपके ही
कर कमलों से ,
इन्हीं कर कमलों से ही तो
बनी है हम सबकी काया भी।
आपके अप्रतिम सामर्थ्य को
शीश झुका - करता नमन ,
मैं बारम्बार ,बारम्बार
हे प्रभु ! हे प्रभु !!
आप तो सृष्टा हो,
बनाये आपने बादल ,
धरा और आकाश आपने ही बनाया
बनाया सूरज
चाँद भी बनाया ,
लिखा हम सब का प्रारब्ध भी आपने
प्रभु !
सब कुछ तो हुआ है आपके ही
कर कमलों से ,
इन्हीं कर कमलों से ही तो
बनी है हम सबकी काया भी।
आपके अप्रतिम सामर्थ्य को
शीश झुका - करता नमन ,
मैं बारम्बार ,बारम्बार
हे प्रभु ! हे प्रभु !!
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