Monday, 2 June 2014

इतने सारे अपरिचितों के बीच में ...

हे प्रभु !

आपकी वास्तविकता का 
अंतिम छोर खोज लूँ , नहीं संभव, नहीं संभव ,

निज की वास्तविकता का ही छोर नहीं पता जब 
तो आपकी वास्तविकता के पीछे कैसे दौड़ूं 
या दौड़ूं  भी या  नहीं ?

मेरा तो मत यही है कि दौड़ूं 
आपके पीछे ,उसी प्रकार -

जिस प्रकार एक बालक कातर स्वर में  रोते  हुए 
दौड़ता है 
अपने पिता के पीछे 

जब ,पिता पहली बार बालक को विद्यालय में 
"अपरिचितों" के बीच छोड़ कर जाता है ,
तो बालक  दौड़ता है पिता के पीछे 

प्रभु ! आपने भी तो मुझे जीवन के  इस
 'महा -महा-विद्यालय" 
में छोड़ा है, इतने सारे अपरिचितों के बीच में ,

तब , मेरा , अबोध बालक के समान 
आपके पीछे  दौड़ना स्वाभाविक है 

अनुकूल है
 एक बालक की मूल प्रकृति के अनुसार।  

हे प्रभु ! हे प्रभु !!

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