हे प्रभु !
आपकी वास्तविकता का
अंतिम छोर खोज लूँ , नहीं संभव, नहीं संभव ,
निज की वास्तविकता का ही छोर नहीं पता जब
तो आपकी वास्तविकता के पीछे कैसे दौड़ूं
या दौड़ूं भी या नहीं ?
मेरा तो मत यही है कि दौड़ूं
आपके पीछे ,उसी प्रकार -
जिस प्रकार एक बालक कातर स्वर में रोते हुए
दौड़ता है
अपने पिता के पीछे
जब ,पिता पहली बार बालक को विद्यालय में
"अपरिचितों" के बीच छोड़ कर जाता है ,
तो बालक दौड़ता है पिता के पीछे
प्रभु ! आपने भी तो मुझे जीवन के इस
'महा -महा-विद्यालय"
में छोड़ा है, इतने सारे अपरिचितों के बीच में ,
तब , मेरा , अबोध बालक के समान
आपके पीछे दौड़ना स्वाभाविक है
अनुकूल है
एक बालक की मूल प्रकृति के अनुसार।
हे प्रभु ! हे प्रभु !!
आपकी वास्तविकता का
अंतिम छोर खोज लूँ , नहीं संभव, नहीं संभव ,
निज की वास्तविकता का ही छोर नहीं पता जब
तो आपकी वास्तविकता के पीछे कैसे दौड़ूं
या दौड़ूं भी या नहीं ?
मेरा तो मत यही है कि दौड़ूं
आपके पीछे ,उसी प्रकार -
जिस प्रकार एक बालक कातर स्वर में रोते हुए
दौड़ता है
अपने पिता के पीछे
जब ,पिता पहली बार बालक को विद्यालय में
"अपरिचितों" के बीच छोड़ कर जाता है ,
तो बालक दौड़ता है पिता के पीछे
प्रभु ! आपने भी तो मुझे जीवन के इस
'महा -महा-विद्यालय"
में छोड़ा है, इतने सारे अपरिचितों के बीच में ,
तब , मेरा , अबोध बालक के समान
आपके पीछे दौड़ना स्वाभाविक है
अनुकूल है
एक बालक की मूल प्रकृति के अनुसार।
हे प्रभु ! हे प्रभु !!
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